बच्चे की कुंडली / नवजात ज्योतिष
बच्चे के जन्म समय से राशि, नक्षत्र, दशा विश्लेषण और जीवन मार्गदर्शन।
बच्चे की कुंडली बनवाएंबच्चे की जन्म कुंडली उसके संपूर्ण जीवन का खाका है। जन्म समय से राशि, नक्षत्र और ग्रह स्थिति देखकर शिक्षा, स्वास्थ्य, करियर और विवाह के बारे में जाना जा सकता है।
नवजात शिशु की कुंडली बनवाना माता-पिता के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इससे बच्चे की प्रकृति, प्रतिभा और संभावित चुनौतियों का पता चलता है। नामकरण संस्कार के लिए भी कुंडली के अनुसार शुभ अक्षर और नाम सुझाए जाते हैं। ज्योतिष सेवाएँ और जन्म कुंडली भी देखें।
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WhatsApp पर संपर्क करें कॉल करेंहिंदू धर्मशास्त्रों में मानव जीवन के 16 संस्कारों में जातकर्म संस्कार और नामकरण संस्कार अत्यंत पवित्र माने गए हैं। शिशु के जन्म लेते ही आकाशीय मंडल में उपस्थित ग्रह-नक्षत्र उसकी जीवन-यात्रा की रूपरेखा तय कर देते हैं। आचार्य पं० राधेश्याम मिश्र जी द्वारा हस्तलिखित व कम्प्यूटरीकृत वैदिक कुंडली में बच्चे के स्वास्थ्य, शिक्षा, बुद्धि और भाग्य का सूक्ष्म विश्लेषण किया जाता है।
27 नक्षत्रों में से 6 नक्षत्र 'गंडमूल नक्षत्र' कहलाते हैं। इन नक्षत्रों में जन्मे बच्चों के जीवन, स्वास्थ्य या माता-पिता पर इसका विशेष प्रभाव पड़ता है:
| गंडमूल नक्षत्र | स्वामी ग्रह | संभावित फल व प्रभाव | शांति समय |
|---|---|---|---|
| अश्विनी व मघा | केतु | प्रथम चरण में पिता को कष्ट, अन्य चरणों में मान-सम्मान व वैभव। | जन्म के 27वें दिन (समान नक्षत्र आने पर) |
| आश्लेषा व ज्येष्ठा | बुध | माता या बड़े भाई को कष्ट, धन हानि की संभावना। | जन्म के 27वें दिन 27 कुओं/वृक्षों के जल से स्नान |
| मूल व रेवती | केतु / बुध | माता-पिता को कष्ट अथवा संतान को स्वयं स्वास्थ्य पीड़ा। | मूल शांति हवन व ब्राह्मण भोज विधान |
जन्म समय के चंद्र नक्षत्र और चरण से शास्त्रोक्त नामाक्षर निकलता है। सही नामाक्षर पर रखा गया नाम बच्चे के ओज, आत्मविश्वास और भाग्य को जीवनभर सक्रिय रखता है।
जन्म कुंडली में चंद्रमा के 6ठे, 8वें या 12वें भाव में पापकक्रांत होने पर बालारिष्ट योग बनता है, जिससे शिशु बार-बार बीमार पड़ता है। इसके लिए महामृत्युंजय जप व चांदी का चंद्रमा धारण कराया जाता है।
उ०: जन्म के तुरंत बाद या पहले 11 दिनों के भीतर कुंडली बनवा लेनी चाहिए, ताकि यदि गंडमूल दोष या कोई अरिष्ट योग हो, तो 27वें दिन से पहले उसकी शांति पूजा की पूरी तैयारी की जा सके।
उ०: नहीं, 12 वर्ष की आयु तक बच्चों को कोई भी भारी रत्न नहीं पहनाना चाहिए। इस आयु तक केवल चांदी का अर्धचंद्र, नजर रक्षा कवच या 1 मुखी/गौरी-शंकर रुद्राक्ष ही सात्विक रूप से धारण कराया जाता है।
उ०: बिल्कुल। कुंडली के पंचम भाव (बुद्धि) और नवम भाव (उच्च शिक्षा/भाग्य) से यह स्पष्ट हो जाता है कि बच्चा विज्ञान, गणित, कला, चिकित्सा या प्रशासनिक सेवाओं में से किस क्षेत्र में सर्वोच्च सफलता प्राप्त करेगा।
28+ वर्षों का वैदिक ज्योतिष अनुभव। AIFAS और AICAS गोल्ड मेडलिस्ट। बच्चों की कुंडली में विशेषज्ञता।
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