अष्टम महाविद्या साधना
कोर्ट-कचहरी, राजनैतिक षड्यंत्र, भूमि विवाद और शत्रुओं की कुबुद्धि को कीलित करने वाली साक्षात पीताम्बरा महाशक्ति।
आचार्य जी से परामर्श लेंसौवर्णासनसंस्थितां त्रिनयनां पीतांशुकोल्लासिनीं, हेमाभांगरुचिं शशांकमुकुटां सच्चम्पकस्रग्युताम्। हस्ते मुद्गरमन्वहं विदधतीं मन्त्राधिनाथप्रियां, वामेनावमृद्य जिह्वामपरां दैत्यं महावैरिणम्॥ — श्री बगलामुखी सहस्रनाम एवं सांख्य तन्त्र
दश महाविद्याओं में अष्टम स्थान पर विराजित माँ बगलामुखी को ब्रह्मांड की संहारक और स्तम्भन शक्ति की अधिष्ठात्री माना जाता है। तंत्र शास्त्र में इनका नाम "वल्गामुखी" भी मिलता है, जिसका अपभ्रंश रूप बगलामुखी है। 'वल्गा' का अर्थ होता है घोड़े की लगाम। जिस प्रकार लगाम खींचते ही अनियंत्रित और उन्मत्त घोड़ा एक ही पल में स्थिर हो जाता है, उसी प्रकार माँ बगलामुखी की कृपा दृष्टि पड़ते ही संपूर्ण ब्रह्मांड की विरोधी शक्तियां, हिंसक विचार, शत्रुओं की वाणी, गति और बुद्धि तत्क्षण कीलित (स्तम्भित) हो जाती हैं।
इन्हें पीताम्बरा भी कहा जाता है क्योंकि इनका संपूर्ण स्वरूप स्वर्णिम पीत वर्ण का है—पीले वस्त्र, पीले आभूषण, पीले पुष्प और हल्दी के सरोवर के मध्य इनका दिव्य वास है। ज्योतिषीय दृष्टि से यह शक्ति साक्षात मंगल (Mars) के प्रचंड पराक्रम और केतु (Ketu) के अमोघ अस्त्र की नियंत्रक हैं। जब जातक पर शत्रुओं द्वारा प्राणघातक संकट उत्पन्न हो या निर्दोष होते हुए भी कारागार का भय मंडरा रहा हो, तब माँ बगलामुखी का संरक्षण ही साक्षात विजयश्री का वरदान बनता है।
रुद्रयामल तन्त्र, बगलामुखी रहस्य तथा स्वतन्त्र तन्त्र में माँ बगलामुखी के दिव्य ध्यान का जो विवरण प्राप्त होता है, वह साधक के मन में असीम श्रद्धा और विस्मय उत्पन्न करता है। भगवती एक दिव्य स्वर्ण सिंहासन पर कमल पुष्प पर विराजमान हैं। उनका वर्ण तपाये हुए स्वर्ण के समान देदीप्यमान पीला है। उनके तीन नेत्र हैं जो सूर्य, चंद्र और अग्नि के प्रतीक हैं। मस्तक पर बालचंद्र सुशोभित है और गले में ताजे पीले चंपा तथा चमेली के पुष्पों की माला है। उनके दो प्रमुख हस्त हैं—दाएं हाथ में वे स्वर्ण का मुद्गर (गदा) धारण कर दैत्य के सिर पर प्रहार की मुद्रा में हैं, और बाएं हाथ से वे महादैत्य मदानासुर की जिह्वा (जीभ) को बाहर खींचकर कीलित कर रही हैं।
जिह्वा पकड़ने का गूढ़ आध्यात्मिक रहस्य: वाणी ही संसार में समस्त कलह, वैर और पाप का मूल कारण है। श्रीमद्भगवद्गीता और तंत्र दोनों में वाणी को मन की बाह्य अभिव्यक्ति कहा गया है। जब असुर अपनी वाक-शक्ति से अधर्म का विस्तार करता है, तो माँ बगलामुखी उसकी जिह्वा को पकड़कर उसकी कुत्सित बुद्धि और वाणी को स्तम्भित कर देती हैं। आध्यात्मिक साधक के लिए यह अंतर्मुखी अवस्था का प्रतीक है—जहां चित्त के समस्त व्यर्थ विचार और वाचालता शांत होकर समाधि में लीन हो जाते हैं।
पौराणिक प्राकट्य की कथा: स्वतन्त्र तन्त्र के अनुसार, सत्ययुग में एक बार संपूर्ण चराचर जगत में महाविनाशकारी वात-क्षोभ (प्रलयंकारी आंधी-तूफान) उत्पन्न हुआ। इस महातूफान की प्रचंडता ऐसी थी कि संपूर्ण सृष्टि का अस्तित्व संकट में पड़ गया। तब जगत के पालनहार भगवान विष्णु अत्यंत चिंतित होकर सौराष्ट्र (वर्तमान गुजरात) में हरिद्रा सरोवर (हल्दी का पवित्र सरोवर) के तट पर पहुंचे। भगवान विष्णु ने सृष्टि की रक्षा हेतु घोर तपस्या आरंभ की। भगवान विष्णु की अनन्य तपस्या और आर्त पुकार से प्रसन्न होकर हरिद्रा सरोवर के जल से वैशाख शुक्ल अष्टमी (बगलामुखी जयंती) की अर्धरात्रि में पीत तेजपुंज के मध्य साक्षात भगवती बगलामुखी प्रकट हुईं। देवी ने अपने अमोघ स्तम्भन प्रभाव से उस प्रलयंकारी तूफान को एक ही क्षण में शांत कर दिया। तत्पश्चात मदानासुर नामक असुर जिसने वाक-सिद्धि प्राप्त कर देवताओं को पीड़ित कर रखा था, देवी ने उसकी जिह्वा खींचकर उसका वध किया और देवताओं को भयमुक्त किया।
वैदिक ज्योतिष में युद्ध, पराक्रम, शत्रुता, रक्त और भूमि का स्वामी मंगल ग्रह है। जब मंगल अनिष्टकारी होकर कुंडली में बैठता है, तो व्यक्ति का जीवन मुकदमों, कलह और रक्तपात से भर जाता है। माँ बगलामुखी मंगल की परा-अधिष्ठात्री हैं:
इतिहास साक्षी है कि राजा-महाराजाओं और आधुनिक युग के राजनेताओं ने भी विषम संकटों के समय माँ बगलामुखी के चरणों में शीश नवाया है। इस साधना के प्रमुख फल निम्नलिखित हैं:
माँ बगलामुखी की साधना को तंत्र शास्त्र में "ब्रह्मास्त्र विद्या" कहा गया है। जिस प्रकार ब्रह्मास्त्र का संधान अत्यंत सावधानी और एकाग्रता से किया जाता है, उसी प्रकार इस मंत्र का उच्चारण पूर्ण शुद्ध होना चाहिए:
१. एकाक्षरी मूल बीज मंत्र:
॥ ह्लीं ॥ (Hleem / हल्लीं)
२. षट्त्रिंशदक्षरी (३६ अक्षर) महा ब्रह्मास्त्र मंत्र:
॥ ॐ ह्लीं बगलामुखि सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा ॥
बगलामुखी यंत्र को साक्षात ब्रह्मास्त्र का केंद्र माना जाता है। इस यंत्र की प्राण-प्रतिष्ठा के बिना बगलामुखी साधना का पूर्ण फल प्राप्त नहीं हो सकता।
भारतवर्ष में माँ बगलामुखी के तीन अत्यंत जाग्रत और ऐतिहासिक सिद्ध पीठ हैं जहां किए गए अनुष्ठान कभी निष्फल नहीं होते:
श्री पीताम्बरा पीठ, दतिया (म.प्र.)
पता / स्थान: पीताम्बरा पीठ, दतिया, मध्य प्रदेश 475661।
ऐतिहासिक महत्व: 1935 में पूज्यपाद राष्ट्रगुरु स्वामी जी महाराज द्वारा स्थापित यह पीठ भारत का सबसे प्रभावशाली बगलामुखी शक्तिपीठ माना जाता है। 1962 में भारत-चीन युद्ध और 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय तत्कालीन भारत सरकार के अनुरोध पर यहां राष्ट्र रक्षा हेतु विशाल बगलामुखी महायज्ञ कराए गए थे, जिसके तत्काल बाद युद्ध विराम की घोषणा हुई थी। देश के शीर्ष राजनेता, न्यायाधीश और विशिष्टजन यहां गुप्त अनुष्ठान कराते हैं।
कैसे पहुँचें: दिल्ली-मुंबई मुख्य रेल मार्ग पर दतिया रेलवे स्टेशन है। ग्वालियर हवाई अड्डा लगभग 75 किमी दूर है।
दर्शन समय: प्रातः 6:30 से 12:00 तथा सायं 5:00 से रात्रि 9:30। मैप पर देखें
लखुंदर नदी तट, नलखेड़ा (म.प्र.)
पता / स्थान: नलखेड़ा, जिला आगर मालवा, मध्य प्रदेश 465445। लखुंदर नदी के रमणीय तट पर स्थित।
ऐतिहासिक महत्व: महाभारत कालीन मान्यता के अनुसार कौरवों पर विजय प्राप्त करने हेतु भगवान श्रीकृष्ण के निर्देश पर धर्मराज युधिष्ठिर ने इसी स्थान पर माँ बगलामुखी की घोर तपस्या की थी और त्रिशक्ति रूप में देवी की स्थापना की थी। यहां माँ बगलामुखी के साथ महालक्ष्मी और महासरस्वती भी विराजित हैं। यहां 24 घंटे तांत्रिक हवन कुंड में आहुतियां दी जाती हैं।
कैसे पहुँचें: उज्जैन से लगभग 100 किमी और इंदौर हवाई अड्डे से 150 किमी सड़क मार्ग द्वारा।
दर्शन समय: प्रातः 5:00 से रात्रि 10:00 तक खुला रहता है। मैप पर देखें
बनखंडी, जिला कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश
पता / स्थान: बनखंडी, रानीताल-देहरा मार्ग, जिला कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश 177114।
ऐतिहासिक महत्व: द्वापर युग में अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने अर्जुन के नेतृत्व में यहां बगलामुखी देवी की विधिवत आराधना की थी और अमोघ अस्त्र प्राप्त किए थे। कांगड़ा घाटी के शांत और प्राकृतिक परिवेश में स्थित यह मंदिर उत्तर भारत के श्रद्धालुओं के लिए अगाध श्रद्धा का केंद्र है।
कैसे पहुँचें: कांगड़ा हवाई अड्डा (गग्गल) से 30 किमी और निकटतम रेलवे स्टेशन पठानकोट या कांगड़ा मंदिर है।
दर्शन समय: प्रातः 6:00 से सायं 8:30 तक। मैप पर देखें
चूंकि बगलामुखी ब्रह्मास्त्र विद्या है, अतः इसमें तनिक भी त्रुटि साधक के लिए घातक हो सकती है। तांत्रिक ग्रंथों में इसके लिए कठोर निर्देश दिए गए हैं:
28+ वर्षों का गहन वैदिक ज्योतिष एवं महाविद्या तांत्रिक अनुष्ठान अनुभव। AIFAS एवं AICAS स्वर्ण पदक विजेता (Gold Medalist)। माँ बगलामुखी पीताम्बरा साधना, शत्रु स्तम्भन, कोर्ट-कचहरी विजय, राजनीतिक रक्षा एवं मंगल-केतु दोष शमन के विशेषज्ञ। अयोध्या धाम से देश और विदेश के प्रतिष्ठित साधकों, अधिवक्ताओं और व्यवसायियों का प्रामाणिक मार्गदर्शन।
पंडित जी के बारे में अधिक जानेंउत्तर: यदि आप सत्य और न्याय के पक्ष में हैं और आपके विरुद्ध षड्यंत्र रचे जा रहे हैं, तो माँ बगलामुखी का 36,000 या 1,25,000 मंत्र जप अनुष्ठान विरोधी पक्ष की कुत्सित बुद्धि और वाक-शक्ति को स्तम्भित कर देता है। परिस्थितियां आपके अनुकूल बनती हैं और न्याय की विजय होती है।
उत्तर: हाँ, गृहस्थ साधक आत्मरक्षा, व्यापारिक बाधा निवारण और मंगल दोष शांति हेतु सात्विक भाव से पीताम्बरा साधना कर सकते हैं। इसके लिए घर में सिद्ध बगलामुखी यंत्र स्थापित कर नित्य 1 या 3 माला जप किया जा सकता है। उग्र तांत्रिक अनुष्ठान योग्य गुरु के सानिध्य में ही कराना चाहिए।
उत्तर: इस साधना में शुद्ध और संस्कारित हल्दी की गांठों से बनी 'हरिद्रा माला' (Turmeric Mala) ही शास्त्र-सम्मत है। यदि हरिद्रा माला उपलब्ध न हो तो पीले हकीक की माला का उपयोग किया जा सकता है। रुद्राक्ष या तुलसी की माला से यह जप नहीं किया जाता।
उत्तर: संकल्प के अनुसार 11 दिन, 21 दिन अथवा 36 दिन का समय लगता है। प्रतिदिन निश्चित संख्या में माला जप किया जाता है और अंतिम दिन दशांश हवन, तर्पण, मार्जन एवं ब्राह्मण भोजन कराकर अनुष्ठान को पूर्णता दी जाती है।
उत्तर: हाँ, शास्त्रों में 'प्रतिनिधि अनुष्ठान' का पूर्ण विधान है। यदि जातक व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने में असमर्थ है, तो आचार्य जी उसके नाम, गोत्र और विशिष्ट संकल्प के साथ अयोध्या धाम में वैदिक ब्राह्मणों द्वारा अनुष्ठान संपन्न कराकर सिद्ध यंत्र व प्रसाद डाक द्वारा प्रेषित करते हैं।
शत्रु भय, झूठे मुकदमे, प्रशासनिक संकट व मंगल दोष से मुक्ति हेतु आज ही आचार्य जी से व्यक्तिगत परामर्श लें।