प्रथम महाविद्या — काल संहारिणी
तोडल तंत्र व मुण्डमाला तंत्र सम्मत प्रामाणिक दक्षिण काली अनुष्ठान। भय मुक्ति, दीर्घायु और आंतरिक शक्ति का महावरदान।
आचार्य जी से परामर्श लेंकरालवदनां घोरां मुक्तकेशीं चतुर्भुजाम्। कालिकां दक्षिणां दिव्यां मुण्डमालाविभूषिताम्॥
सद्यश्छिन्नशिरः खड्गौ वामाधोर्ध्वकरक्रमात्। अभयं वरदं चैव दक्षिणाधोर्ध्वकम् पुनः॥
दश महाविद्याओं में प्रथम और सर्वोच्च स्थान भगवती महाकाली का है। महाकाली वह परात्पर शक्ति हैं जो संपूर्ण सृष्टि के लय और संहार की अधिष्ठात्री हैं। काल यानी समय को भी जो अपने उदर में समाहित कर ले, वही काली है। तंत्र शास्त्र में माँ काली को परम दयामयी और तुरंत फल देने वाली जगन्माता माना गया है। भौतिक जीवन में अकाल मृत्यु का भय, घोर शत्रु षड्यंत्र, अनसुलझे न्यायालयी विवाद, तंत्र-अभिचार दोष तथा जन्मकुंडली में शनि देव की साढ़ेसाती, ढैय्या एवं राहु-केतु के विषैले योगों को नष्ट करने के लिए माँ काली की उपासना के समान कोई दूसरा आश्रय नहीं है।
ज्योतिषीय दृष्टि से माँ काली का सीधा संबंध शनि ग्रह (Saturn) और छाया ग्रह राहु (Rahu) से है। जब जीवन में चारों ओर अंधकार छा जाए, प्रगति के सभी मार्ग अवरुद्ध हो जाएं और मृत्यु तुल्य कष्ट आ घेरें, तब दक्षिण काली का आश्रय साधक को नवजीवन और असीम आत्मबल प्रदान करता है।
माँ काली का स्वरूप दिखने में जितना उग्र और संहारक है, अंतर्मन में वह साधक के प्रति उतना ही वात्सल्यपूर्ण और करुणामयी है। माँ काली के कृष्ण वर्ण (गहरे काले या नील वर्ण) का तात्विक अर्थ है कि जिस प्रकार सभी रंग काले रंग में विलीन हो जाते हैं, उसी प्रकार संसार के समस्त नाम, रूप, ग्रह, काल और संपूर्ण ब्रह्मांड प्रलयकाल में भगवती काली की चिदाकाश शून्यता में समाहित हो जाते हैं।
देवी के चार हाथ मानवीय चेतना और कर्म के चार आयामों को दर्शाते हैं। उनके बाएं ऊपरी हाथ में तीक्ष्ण खड्ग है, जो अज्ञान, भ्रम और माया के पाश को एक झटके में काट देता है। बाएं निचले हाथ में रक्त से सिक्त सद्यश्छिन्न नरमुंड है, जो मनुष्य के संकुचित अहंकार (Ego) के विनाश का प्रतीक है। वहीं देवी के दोनों दाहिने हाथ साधक के लिए अत्यंत अभयकारी हैं—ऊपरी दाहिना हाथ अभय मुद्रा में है जो समस्त सांसारिक और पारलौकिक भयों से रक्षा करता है, तथा निचला दाहिना हाथ वरद मुद्रा में है जो साधक की समस्त लौकिक मनोकामनाएं, धन, आरोग्य व मोक्ष प्रदान करता है।
पौराणिक उत्पत्ति: देवी महात्म्य (दुर्गा सप्तशती) के सप्तम अध्याय के अनुसार जब चण्ड और मुण्ड नामक दैत्य माँ अम्बिका पर आक्रमण करने आए, तब भगवती कौशिकी के ललाट से अत्यंत क्रुद्ध होकर काली का प्राकट्य हुआ। उन्होंने अपने विकराल रूप से चण्ड-मुण्ड का संहार कर 'चामुण्डा' नाम प्राप्त किया। इसके उपरांत जब रक्तबीज का वध असंभव प्रतीत हो रहा था—क्योंकि उसके रक्त की प्रत्येक बूंद से नए असुर जन्म ले रहे थे—तब माँ काली ने अपने खप्पर में उसका रक्त पीकर संपूर्ण देवलोक की रक्षा की।
तोडल तंत्र और मुण्डमाला तंत्र में स्पष्ट वर्णित है कि भगवान शिव शवरूप में भूमि पर लेटे हैं और माँ काली उनके वक्षस्थल पर दक्षिण चरण (दायां पैर) रखे हुए हैं। शिव पुरुष (अक्रिय चेतना) हैं और काली प्रकृति (सक्रिय गतिज ऊर्जा) हैं। बिना शक्ति के शिव 'शव' समान हैं। जब देवी का दायां पैर शिव पर पड़ता है, तो वह 'दक्षिण काली' कहलाती हैं, जो गृहस्थों के समस्त पापों को नष्ट कर उन्हें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थ प्रदान करती हैं।
वैदिक ज्योतिष में नवग्रहों की पीड़ा से मुक्ति हेतु दश महाविद्याओं की अधिष्ठात्री शक्तियों का विधान महर्षि पराशर व तंत्र ग्रंथों में मिलता है। तोडल तंत्र के दसवें पटल के अनुसार माँ काली का आधिपत्य सीधे शनि ग्रह पर है।
माँ काली की नित्य पूजा और विधिवत साधना से साधक को लौकिक और आध्यात्मिक दोनों स्तरों पर क्रांतिकारी लाभ प्राप्त होते हैं:
माँ काली की साधना अत्यंत संवेदनशील और शक्तिशाली होती है। इसलिए इसका अनुष्ठान शास्त्रसम्मत नियमों और वैदिक मर्यादाओं में रहकर ही किया जाना चाहिए।
॥ क्रीं ॥ (Kring)
यह माँ काली का प्राण बीज है। इसमें 'क' वर्ण काली का सूचक है, 'र' वर्ण ब्रह्म का, 'ई' वर्ण महामाया का और अनुस्वार दुःखहर्ता नाद का प्रतीक है। इस बीज मंत्र का मानसिक जप साधक के अंतःकरण को शुद्ध करता है।
॥ ॐ क्रीं कालिकायै नमः ॥
॥ ॐ क्रीं क्रीं क्रीं हूँ हूँ ह्रीं ह्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं हूँ हूँ ह्रीं ह्रीं स्वाहा ॥
॥ ॐ कालिकायै च विद्महे श्मशानवासिन्यै धीमहि तन्नो घोरा प्रचोदयात् ॥
यंत्र को देवी का शरीर कहा गया है ("यंत्रं मन्त्रमयं प्रोक्तं देवता रूपमुच्यते")। काली यंत्र एक अत्यंत गोपनीय और ऊर्जावान ज्यामितीय चक्र है। इसमें केंद्र बिंदु होता है, जिसके चारों ओर पांच अधोमुखी त्रिकोण (शक्ति का प्रतीक), तीन वृत्त (त्रिगुण एवं त्रिकाल), अष्टदल कमल (अष्ट सिद्धियां) और बाह्य चतुष्कोण भूपुर (चार दिशाएं और लोकपाल) होते हैं।
भारत में माँ काली के कई अत्यंत प्राचीन और जाग्रत सिद्ध पीठ हैं, जहाँ दर्शन मात्र से जन्म-जन्मांतर के पाप और ग्रह दोष नष्ट हो जाते हैं:
स्थान व महत्व: कोलकाता स्थित कालीघाट 51 शक्तिपीठों में प्रमुख है। यहाँ माँ सती के दाएं पैर की चार उंगलियां गिरी थीं। यहाँ माँ दक्षिण काली का दिव्य स्वरूप विराजमान है, जिनकी विशाल स्वर्ण जिह्वा और तीन नेत्र भक्तों को अभय प्रदान करते हैं।
साधना महत्व: यहाँ किया गया जप और संकल्प शीघ्र सिद्ध होता है। यह पीठ तांत्रिकों और अघोरियों की परम साधना स्थली रही है।
स्थान व महत्व: हुगली नदी के तट पर रानी रासमणि द्वारा स्थापित यह वह पावन स्थल है जहाँ परमहंस रामकृष्ण देव ने माँ भवतारिणी काली से साक्षात् वार्तालाप किया था।
साधना महत्व: यह मंदिर भक्ति, वात्सल्य और सात्त्विक साधना का विश्व प्रसिद्ध केंद्र है। यहाँ माँ अपने भक्तों के समस्त सांसारिक कष्ट हर लेती हैं।
स्थान व महत्व: महाभारत कालीन सूर्यकूट पर्वत पर स्थित मनोकामना सिद्ध पीठ। माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण और पाण्डवों ने महाभारत युद्ध से पूर्व यहाँ माँ काली की आराधना की थी।
साधना महत्व: नवरात्र और शनिवार को यहाँ लाखों भक्त शनि दोष, राहु पीड़ा और मुकदमों में विजय हेतु दर्शन करते हैं।
स्थान व महत्व: अवंतिका नगरी (उज्जैन) में स्थित गढ़कालिका मंदिर, जहाँ महाकवि कालिदास ने माँ काली की उपासना करके असीम ज्ञान और वाकसिद्धि प्राप्त की थी। पास ही 51 शक्तिपीठों में एक हरसिद्धि पीठ भी है।
साधना महत्व: बुद्धि, विद्या, राजसत्ता और कालसर्प दोष शांति के लिए यह सिद्ध भूमि मानी जाती है।
तोडल तंत्र एवं वैदिक ज्योतिष के अनुसार शनि ग्रह के अधिष्ठाता रूप में प्रथम महाविद्या माँ काली पूजित हैं। माँ काली की सात्त्विक साधना व 'क्रीं' एकाक्षरी मंत्र के विधिवत जप से शनि देव का उग्र प्रभाव शांत होता है, साढ़ेसाती, ढैय्या, कंटक शनि व अष्टम शनि के समय होने वाली शारीरिक व्याधियाँ, आर्थिक हानि और मानसिक अवसाद पूर्णतः दूर होते हैं।
हाँ, गृहस्थ साधक माँ दक्षिण काली के सौम्य मातृ रूप की सात्त्विक साधना पूर्ण श्रद्धा से कर सकते हैं। गृहस्थ साधकों को वाममार्गी या श्मशान साधना से दूर रहकर शुद्ध वैदिक अथवा दक्षिणाचार पद्धति, लाल पुष्प, फल, धूप-दीप व नैवेद्य अर्पित करते हुए मानसिक जप करना चाहिए। योग्य गुरु का मार्गदर्शन अनिवार्य होता है।
माँ काली का परम शक्तिशाली एकाक्षरी बीज मंत्र 'क्रीं' (Kring) है। इसके अतिरिक्त त्रि-अक्षरी मंत्र 'ॐ क्रीं क्रीं क्रीं हूँ हूँ ह्रीं ह्रीं स्वाहा' अथवा नवार्ण मंत्र सदृश 'ॐ क्रीं कालिकायै नमः' का जप किया जाता है। रुद्राक्ष की माला पर नित्य 11 माला अथवा 1.25 लाख जप का संकल्प लेकर 21 या 41 दिनों में अनुष्ठान पूर्ण किया जाता है।
काली यंत्र की स्थापना उत्तर अथवा पूर्व दिशा की ओर मुख करके कृष्ण पक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या अथवा नवरात्रि के पावन काल में निशीथ काल (मध्य रात्रि) अथवा ब्रह्म मुहूर्त में करनी चाहिए। ताम्रपत्र अथवा अष्टधातु पर उत्कीर्ण प्राण प्रतिष्ठित यंत्र पर पंचामृत अभिषेक कर रक्त चंदन व लाल गुड़हल अर्पित करें।
साधना काल में पूर्ण ब्रह्मचर्य, सत्य भाषण, सात्त्विक आहार (लहसुन, प्याज व मदिरा से सर्वथा परहेज), भूमि शयन अथवा स्वच्छ एकान्त आसन तथा मन में क्रोध और अहंकार का त्याग आवश्यक है। बिना गुरु रक्षा कवच व संकल्प के उग्र प्रयोग कभी न करें।
28+ वर्षों का वैदिक ज्योतिष और तंत्र शास्त्र अनुभव। AIFAS एवं AICAS गोल्ड मेडलिस्ट। दश महाविद्या साधना, शनि-राहु ग्रह शांति एवं जटिल कुण्डली दोष निवारण में विशेष दक्षता। तोडल तंत्र एवं मुण्डमाला तंत्र के प्रामाणिक सूत्रों के आधार पर देश-विदेश के साधकों को सुरक्षित व सात्त्विक मार्गदर्शन प्रदान कर रहे हैं।
पंडित जी के बारे में अधिक जानेंअपनी जन्मकुंडली के अनुसार सटीक इष्ट महाविद्या निर्धारण, प्राण प्रतिष्ठित काली यंत्र एवं प्रामाणिक संकल्प विधि प्राप्त करें।