पंचम महाविद्या — तपोमयी चैतन्य भैरवी
तोडल तंत्र व भैरवी तंत्र सम्मत प्रामाणिक वैदिक अनुष्ठान। हीनभावना, भय व प्रेत बाधा का समूल नाश, अदम्य आत्मबल और कुंडलिनी जागरण।
आचार्य जी से परामर्श लेंउद्यद्भानुसहस्रकान्तिमरुणक्षौमां शिरोमालिनीं रक्तालिप्तपयोधरां जपवटीं विद्यामभीतिं वरम्।
हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्रविलसद्वक्त्रारविन्दश्रियं देवीं बद्धहिमांशुशकलमुकुटां वन्दे समन्दस्मिताम्॥
दश महाविद्याओं में पंचम स्थान परम तेजस्विनी भगवती माँ त्रिपुर भैरवी का है। 'भैरवी' का अर्थ है जो भय को हरने वाली और दुष्टों के लिए साक्षात् भय रूप हैं। वे तीनों लोकों (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) में विद्यमान संहारक और विनाशकारी विकारों को भस्म करने वाली जाग्रत ज्वाला हैं। तंत्र शास्त्र में माँ त्रिपुर भैरवी को भगवान कालभैरव की मूल सहचारिणी शक्ति और समस्त योगियों की इष्टदेवी माना गया है।
ज्योतिषीय दृष्टि से माँ त्रिपुर भैरवी का सीधा संबंध लग्न भाव (Ascendant) और मंगल ग्रह (Mars) से है। जब किसी जातक की कुंडली में लग्न निर्बल हो, आत्मबल क्षीण हो चुका हो, व्यक्ति हीनभावना (Inferiority Complex) से ग्रस्त होकर जीवन में कोई निर्णय न ले पा रहा हो, अथवा मंगल दोष व अंगारक योग के कारण रक्त विकार व आकस्मिक दुर्घटनाओं का भय बना रहता हो, तब माँ त्रिपुर भैरवी की साधना साधक को सिंह के समान निर्भीक बना देती है।
माँ त्रिपुर भैरवी का स्वरूप ध्यान श्लोक के अनुसार प्रातःकालीन सहस्र उदित सूर्यों के समन्वित तेज के समान अत्यंत दीप्तिमान और रक्ताभ (लाल) है। देवी ने लाल रंग के रेशमी वस्त्र धारण किए हुए हैं और उनके गले में मुण्डमाला शोभायमान है। उनके मस्तक पर जटाजूट में बालचंद्र (दूज का चांद) सुशोभित है और उनके तीन नेत्र हैं जो साधक के अंतर्मन के त्रिताप (आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक) को भस्म करते हैं।
देवी के चार कर-कमल हैं: ऊपरी दाहिने हाथ में अक्षमाला (जपमाला) है जो निरंतर साधना, नाम जप और निष्ठा का प्रतीक है। ऊपरी बाएं हाथ में विद्या पुस्तक (शास्त्र ग्रंथ) है जो यह दर्शाती है कि भैरवी मात्र संहारक नहीं, बल्कि वे समस्त वेदों और ब्रह्मविद्या की स्वामिनी हैं। निचला दाहिना हाथ अभय मुद्रा में है जो साधक को काल, शत्रु और मृत्यु के भय से अभय दान देता है। निचला बायां हाथ वरद मुद्रा में है जो साधक के संपूर्ण मनोरथों को सिद्ध करता है।
पौराणिक उत्पत्ति: नारद पांचरात्र एवं तोडल तंत्र के अनुसार जब भगवान शिव ने महाप्रलय का निश्चय किया, तब उनकी संहारक शक्ति 'कालभैरव' के रूप में उदित हुई। उसी समय भगवती सती ने अपने भीतर की संपूर्ण तपस्या की प्रचंड अग्नि को घनीभूत करके भैरवी के रूप में प्राकट्य लिया। देवी ने अपने तेज से संपूर्ण ब्रह्मांड के तमस, आलस्य और अज्ञान को जलाकर भस्म कर दिया।
माँ भैरवी के तेरह स्वरूप: तंत्र शास्त्रों में माँ भैरवी के 13 प्रमुख स्वरूपों की पूजा होती है—सिद्ध भैरवी, चैतन्य भैरवी, भुवनेश्वर भैरवी, कमलेश्वरी भैरवी, कौलेश्वर भैरवी, कामेश्वरी भैरवी, नित्या भैरवी, रुद्र भैरवी, भद्र भैरवी, षट कूट भैरवी, सकल सिद्धि भैरवी, संपत्प्रदा भैरवी और काल भैरवी। गृहस्थ साधकों के लिए 'चैतन्य भैरवी' और 'सिद्ध भैरवी' की साधना सर्वाधिक फलदायी मानी गई है।
वैदिक ज्योतिष में जन्मकुंडली का प्रथम भाव अर्थात लग्न संपूर्ण जीवन का दर्पण होता है। तोडल तंत्र के अनुसार त्रिपुर भैरवी का आधिपत्य लग्न और मंगल ग्रह पर है।
माँ त्रिपुर भैरवी की विधिवत सात्त्विक साधना से साधक को लौकिक जीवन में अजेय सामर्थ्य प्राप्त होता है:
माँ त्रिपुर भैरवी की साधना में लाल रंग की वस्तुओं और मंत्रों के सटीक उच्चारण का विशेष महत्व है।
॥ भ्रीं ॥ (Bhreeng)
यह भैरवी का एकाक्षरी संपुट बीज है जो समस्त भयों का नाश कर आंतरिक तेज भरता है।
॥ ह्स्रैं ह्स्क्लीं ह्स्रौः ॥ (Hsraim Hskleem Hsrauh)
यह त्रिपुर भैरवी का प्रसिद्ध सिद्ध मंत्र है। इसमें वाग्भव, कामराज और शक्ति कूट का समन्वय है। यह साधक के व्यक्तित्व में चुंबकीय आकर्षण और अदम्य साहस उत्पन्न करता है।
॥ ॐ ह्रीं भैरव्यै नमः ॥
॥ ॐ त्रिपुरायै विद्महे भैरव्यै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
त्रिपुर भैरवी यंत्र एक अत्यंत तीक्ष्ण और शक्तिशाली ऊर्जा चक्र है। इसमें केंद्र बिंदु, उसके चारों ओर अधोमुखी और ऊर्ध्वमुखी त्रिकोण (शक्ति और शिव का मिलन), अष्टदल कमल, तीन वलय और चार दिशाओं वाला भूपुर होता है।
भारत में माँ त्रिपुर भैरवी के अत्यंत जाग्रत और प्राचीन तीर्थ हैं जहाँ दर्शन मात्र से भय का नाश होता है:
स्थान व महत्व: कामाख्या शक्तिपीठ परिसर में भैरवी पर्वत पर माँ त्रिपुर भैरवी का अत्यंत जाग्रत मंदिर है।
साधना महत्व: तांत्रिक साधक कामाख्या में साधना की शुरुआत भैरवी दर्शन और अनुमति से ही करते हैं। यहाँ किया गया जप तुरंत सिद्ध होता है।
स्थान व महत्व: काशी विश्वनाथ मंदिर के समीप मीर घाट पर स्थित अति प्राचीन और चमत्कारी त्रिपुर भैरवी मंदिर।
साधना महत्व: यहाँ दर्शन करने से कालभैरव की कृपा प्राप्त होती है और समस्त प्रकार की प्रेत बाधा व अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है।
स्थान व महत्व: दामोदर और भेड़ा (भैरवी) नदी के पावन संगम पर स्थित अति जाग्रत सिद्ध पीठ।
साधना महत्व: यहाँ माँ छिन्नमस्ता के साथ भैरवी शक्ति का साक्षात् वास है। यहाँ दर्शन करने से जटिल से जटिल संकट क्षण भर में दूर हो जाते हैं।
जन्मकुंडली का लग्न भाव जातक के शरीर, स्वास्थ्य, आत्मबल, तेज और आंतरिक सामर्थ्य का आधार होता है। जब लग्न पाप ग्रहों से पीड़ित हो या लग्नेश निर्बल हो, तो व्यक्ति हीनभावना, संकोच, शारीरिक दुर्बलता और भय का शिकार हो जाता है। पंचम महाविद्या त्रिपुर भैरवी की साधना से लग्न शुद्ध होता है, साधक में अदम्य साहस, आत्मविश्वास और प्रचंड सम्मोहक तेज का प्रादुर्भाव होता है।
तोडल तंत्र के अनुसार त्रिपुर भैरवी उग्र तेज, रक्त तत्व और तपोअग्नि की स्वामिनी हैं। कुंडली में मंगल ग्रह के पीड़ित होने, मांगलिक दोष, अंगारक योग (मंगल-राहु) अथवा रक्त विकारों के होने पर माँ त्रिपुर भैरवी की सात्त्विक उपासना से मंगल का अमंगल प्रभाव शांत होता है और वह शुभ फलदायी पराक्रम में परिवर्तित हो जाता है।
माँ त्रिपुर भैरवी का प्रसिद्ध सिद्ध त्रि-अक्षरी बीज मंत्र 'ह्स्रैं ह्स्क्लीं ह्स्रौः' (Hsraim Hskleem Hsrauh) है। इसके अतिरिक्त एकाक्षरी मंत्र 'भ्रीं' (Bhreeng) तथा नाम मंत्र 'ॐ ह्रीं भैरव्यै नमः' का जप भी किया जाता है। लाल मूंगे अथवा रुद्राक्ष की माला पर नित्य 11 माला अथवा 1.25 लाख जप का संकल्प लेकर 21 दिनों में अनुष्ठान पूर्ण किया जाता है।
भैरवी यंत्र की स्थापना मंगलवार, रवि-पुष्य योग, नवरात्रि अथवा मार्गशीर्ष पूर्णिमा (भैरव जयंती/भैरवी जयंती) के शुभ काल में पूर्व या उत्तर दिशा में करनी चाहिए। ताम्रपत्र या अष्टधातु पर निर्मित प्राण प्रतिष्ठित यंत्र पर रक्त चंदन, कुमकुम और लाल पुष्प अर्पित कर चमेली के तेल या घी का दीपक जलाएं।
हाँ, गृहस्थ साधक माँ त्रिपुर भैरवी के सात्त्विक और दक्षिणाचार रूप की साधना कर सकते हैं। देवी के हाथों में जपमाला और विद्या पुस्तक है, जो ज्ञान और निरंतर तप का प्रतीक है। गृहस्थ साधकों को वाममार्गी या तामसिक प्रयोगों से सर्वथा दूर रहकर केवल भक्ति और आत्म-कल्याण के भाव से ही जप करना चाहिए। योग्य गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक है।
28+ वर्षों का वैदिक ज्योतिष और तंत्र शास्त्र अनुभव। AIFAS एवं AICAS गोल्ड मेडलिस्ट। पंचम महाविद्या माँ त्रिपुर भैरवी साधना, लग्न शुद्धि, मंगल-अंगारक दोष शांति एवं आत्मबल संवर्धन में विशेषज्ञ। तोडल तंत्र एवं भैरवी तंत्र के शास्त्रीय विधान के अनुसार देश-विदेश के साधकों को सात्त्विक व सुरक्षित मार्गदर्शन प्रदान कर रहे हैं।
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